तुम और तुम्हारा प्यार,
एक उलझन ही तो थे।
तुम्हारी यादों को
एक-एक करके समेटा,
धागों में बाँध दिया
सोचा,
अब ये किस्सा यहीं ख़त्म हो गया
कुछ दिन बीते...
फिर एक सुबह,
यूँ ही टहलते हुए
हवा के एक झोंके ने
जाने क्या कह दिया।
ढलते सूरज ने
कानों में आकर
ऐसा शोर मचा दिया
कि बँधा हुआ वो धागा
किसी ढलान पर लुढ़कते बॉल की तरह
धीरे-धीरे,
पूरा का पूरा खुल गया।
और तुम...
तुम्हारी वो बाँधी हुई यादें
एक बार फिर
मेरे आसपास बिखर गईं
और मैं
उन बिखरी हुई यादों में
फिर से उलझ गई
July 31st, 2026
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